शहर के अनुसार मुहूर्त
हर शहर का समय उसके अपने सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय से निकाला गया है, इसलिए हर समय वहीं का स्थानीय समय है। आधी रात के बाद का समय अगले दिन की तारीख के साथ लिखा है।
दिल्ली
| लक्ष्मी पूजा मुहूर्त | – |
|---|---|
| प्रदोष काल (सांझ) | – |
| वृषभ लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| सिंह लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| निशीथ काल (मध्यरात्रि) | – |
मुंबई
| लक्ष्मी पूजा मुहूर्त | – |
|---|---|
| प्रदोष काल (सांझ) | – |
| वृषभ लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| सिंह लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| निशीथ काल (मध्यरात्रि) | – |
जयपुर
| लक्ष्मी पूजा मुहूर्त | – |
|---|---|
| प्रदोष काल (सांझ) | – |
| वृषभ लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| सिंह लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| निशीथ काल (मध्यरात्रि) | – |
लखनऊ
| लक्ष्मी पूजा मुहूर्त | – |
|---|---|
| प्रदोष काल (सांझ) | – |
| वृषभ लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| सिंह लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| निशीथ काल (मध्यरात्रि) | – |
पटना
| लक्ष्मी पूजा मुहूर्त | – |
|---|---|
| प्रदोष काल (सांझ) | – |
| वृषभ लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| सिंह लग्न (स्थिर लग्न) | – |
| निशीथ काल (मध्यरात्रि) | – |
दिवाली 2026: दीपों का पर्व और लक्ष्मी पूजा
इस साल दिवाली रविवार, 8 नवंबर 2026 को है। यह तारीख दिल्ली के हिसाब से हमारे पंचांग से निकली है। दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या की रात मनाई जाती है, और इसी रात घर घर में माँ लक्ष्मीजी की पूजा होती है। आपके शहर का लक्ष्मी पूजा का समय इस पेज की शहरवार समय तालिका में दिया गया है।
दिवाली पांच दिन के उत्सव का बीच का और सबसे बड़ा दिन है। इससे पहले धनतेरस और छोटी दिवाली आती है, और इसके बाद गोवर्धन पूजा और भाई दूज। साफ घर, जलते दीये और शाम की पूजा, यही इस रात का असली रूप है।
लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त कैसे तय होता है
दिवाली उस दिन मानी जाती है जिस दिन का प्रदोष काल अमावस्या तिथि में पड़ता है। लक्ष्मी पूजा शाम की पूजा है, इसलिए सूर्यास्त के बाद का समय ही तारीख तय करता है। तिथि खुद सूर्य और चंद्रमा की दूरी से गिनी जाती है।[1]
लक्ष्मी पूजा के मुहूर्त में तीन बातें एक साथ होनी चाहिए। पहली, अमावस्या तिथि चल रही हो। दूसरी, समय प्रदोष काल के अंदर हो। तीसरी, पूर्व दिशा में वृषभ लग्न उदय हो रहा हो।
प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद रात का पहला पांचवां हिस्सा है। पुरानी गिनती में रात को 15 मुहूर्त में बांटा जाता है, और प्रदोष इनमें से पहले तीन मुहूर्त लेता है। वृषभ एक स्थिर राशि है। परंपरा इस पूजा के लिए स्थिर लग्न को अच्छा मानती है, क्योंकि स्थिर राशि ठहराव का संकेत है।
तालिका में लक्ष्मी पूजा का समय वही हिस्सा है जहां ये तीनों एक साथ मिलते हैं। किसी शहर में तीनों का मेल न बने, तो वहां लक्ष्मी पूजा की पंक्ति नहीं दिखेगी। उस शहर का प्रदोष काल और वृषभ लग्न फिर भी अलग पंक्तियों में दिखते हैं।
निशीथ काल और सिंह लग्न अलग समय हैं
तालिका में देर रात के दो और समय अलग से दिए गए हैं, क्योंकि ये दोनों अलग चीज़ें हैं। निशीथ काल रात का बीच का समय है, यानी रात के 15 मुहूर्तों में से आठवां मुहूर्त। सिंह लग्न वह समय है जब सिंह राशि पूर्व में उदय होती है, और यह आधी रात के बाद तक चल सकता है।
कई परिवार और साधक देर रात की पूजा इन्हीं में से किसी एक समय में करती हैं। पर इन दोनों में से कोई भी प्रदोष वाली लक्ष्मी पूजा नहीं है। घर की आम लक्ष्मी पूजा के लिए प्रदोष, अमावस्या और वृषभ लग्न वाला समय ही देखें।
दिवाली की कथाएं
सबसे जानी मानी कथा श्री रामजी की है। चौदह साल के वनवास और रावण पर जीत के बाद श्री रामजी, माँ सीताजी और लक्ष्मणजी अयोध्या लौटे। अयोध्या के लोगों ने उनके स्वागत में पूरे नगर को दीयों से सजा दिया, और तभी से यह रात दीपावली कहलाई।
दूसरी कथा समुद्र मंथन की है। देवताओं और असुरों ने क्षीर सागर को मथा, तो उसमें से माँ लक्ष्मीजी प्रकट हुईं और श्री विष्णुजी के पास गईं। अग्नि पुराण कहता है कि उन्हें देखकर सभी देवताओं की खोई हुई शोभा लौट आई।[2] इसीलिए दिवाली की रात साफ और रोशन घर में माँ लक्ष्मीजी का स्वागत किया जाता है।
बंगाल और पूर्वी भारत में इसी अमावस्या को काली पूजा होती है, जिसमें माँ कालीजी की आराधना की जाती है। जैन परंपरा इस दिन महावीर स्वामी का निर्वाण याद करती है, और सिख परंपरा इसे बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाती है।
लक्ष्मी पूजा की तैयारी
दिवाली से कुछ दिन पहले पूरे घर की सफाई कर लें। परंपरा मानती है कि माँ लक्ष्मीजी साफ सुथरे घर में ही आती हैं, और यह बात घर और मन दोनों पर लागू होती है। टूटी चीज़ें, बेकार सामान और पुराना कबाड़ पहले ही बाहर कर दें।
दरवाज़े पर रंगोली बनाएं और आम के पत्तों या गेंदे के फूलों का तोरण लगाएं। पूजा के लिए एक चौकी, लाल कपड़ा, कलश, दीये, फूल, रोली, अक्षत, मिठाई और कुछ सिक्के पहले से रख लें। अपने शहर का पूजा समय तालिका से देखकर परिवार को बता दें।
लक्ष्मी पूजा विधि, एक एक कदम
- पूजा का समय तालिका से देखें और उससे पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें।
- चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और माँ लक्ष्मीजी के साथ श्री गणेशजी की मूर्ति या चित्र रखें।
- पानी से भरा तांबे या पीतल का कलश रखें, उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें।
- सबसे पहले श्री गणेशजी की पूजा करें, क्योंकि हर शुभ काम उन्हीं से शुरू होता है।
- श्री गणेशजी को दूर्वा, लाल फूल और लड्डू चढ़ाएं, और ॐ गं गणपतये नमः का 21 बार जाप करें।
- माँ लक्ष्मीजी को कमल या लाल फूल, रोली, अक्षत, फल, मिठाई और सिक्के अर्पित करें।
- श्री सूक्त का पाठ करें, या ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः का 108 बार जाप करें।
- बही खाते, तिजोरी या कारोबार के कागज़ पूजा के पास रखें, इसे चोपड़ा पूजन कहते हैं।
- घी के दीये से आरती करें और ॐ जय लक्ष्मी माता गाएं।
- पूजा के बाद घर के हर कमरे, दरवाज़े, खिड़की और छत पर दीये जलाएं।
- प्रसाद परिवार, पड़ोसियों और घर आने वाले हर व्यक्ति में बांटें।
क्या करें और क्या न करें
पूजा प्रदोष वाले समय में करें, और देर रात की पूजा करनी हो तो निशीथ या सिंह लग्न का समय अलग से देखें। घर में काम करने वालों को उपहार दें और ज़रूरतमंदों को कुछ दान करें। दिवाली की खुशी बांटने से बढ़ती है।
इस दिन नया कर्ज़ लेने से बचें, और दिखावे की फिजूल खरीदारी भी न करें। तेज़ पटाखों से बुज़ुर्गों, बच्चों और जानवरों को परेशानी होती है, इसका ध्यान रखें। जलते दीयों को पर्दों और कपड़ों से दूर रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दिवाली 2026 कब है?+
लक्ष्मी पूजा का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
वह समय जब अमावस्या तिथि, प्रदोष काल और वृषभ लग्न तीनों एक साथ हों। हर शहर का यह समय इस पेज की समय तालिका में अलग से दिया गया है।
क्या निशीथ काल और सिंह लग्न एक ही समय हैं?
नहीं। निशीथ काल रात का आठवां मुहूर्त है, और सिंह लग्न वह समय है जब सिंह राशि उदय होती है। दोनों अलग समय हैं, इसलिए तालिका इन्हें अलग पंक्तियों में दिखाती है।
दिवाली अमावस्या की अंधेरी रात को ही क्यों मनाई जाती है?
सबसे अंधेरी रात में दीये जलाना यही बताता है कि रोशनी अंधेरे पर भारी पड़ती है। परंपरा यह भी मानती है कि माँ लक्ष्मीजी इसी रात घर घर आती हैं।
अगर पूजा का मुहूर्त निकल जाए तो क्या करें?
घबराएं नहीं। अमावस्या चलते हुए शांत मन से पूजा कर लें। समय से ज़्यादा ज़रूरी सच्ची श्रद्धा और साफ घर है।
क्या दूसरे धर्म के लोग भी लक्ष्मी पूजा कर सकते हैं?
हां। दीप जलाना और समृद्धि के लिए प्रार्थना करना सबके लिए खुला है। जैन, सिख और बौद्ध परंपराओं में भी इस रात के अपने उत्सव हैं।
स्रोत
[1] सूर्य सिद्धांत, अध्याय 2, श्लोक 66। चंद्रमा के भोगांश में से सूर्य का भोगांश घटाकर तिथि निकाली जाती है। अनुवाद एबेनेज़र बर्जेस, 1860।
[2] अग्नि पुराण, अध्याय 3, श्लोक 10। समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मीजी का प्रकट होना और देवताओं की शोभा लौटना। अनुवाद एम. एन. दत्त, 1903।
गणना के बारे में: प्रदोष काल, निशीथ काल और लग्न की गणना स्विस एफेमेरिस और लाहिरी अयनांश से, हर शहर के अपने सूर्यास्त पर की गई है। तीनों के मेल से लक्ष्मी पूजा का समय चुनना पंचांग की परंपरा है, ऊपर के ग्रंथों का वचन नहीं।